(अनुष्टुभ)
असंभवं हेममृगस्य जन्म
तथापि रामो लुलुभे मृगाय ।
प्रायः समापन्नविपत्तिकाले
धियोपि पुंसां मालिनी भवन्ति ।।


शतपथ ब्राह्मणम् १४.३.२.२९-३१

पशुबन्धो वै प्रवर्ग्यः। सर्वं वै पशुबन्धः सर्वं प्रवर्ग्यः स यदधिश्रितस्तत्प्रवृक्तॊ यदासन्नस्तद्रुचितो यद्धुतस्तत्पिन्वितॊ यदा वै पशुबन्धः पिन्वतेऽथैनं सर्वे देवाः सर्वाणि भूतान्युपजीवन्ति पिन्वते ह वाऽअस्मै पशुबन्धो य एवमेतद्वेद।२९।
सोमो वै प्रवर्ग्यः। सर्वं वै सोमः सर्वं प्रवर्ग्यः स यदभिषुतस्तत्प्रवृक्तो यदुन्नीतस्तद्रुचितो यद्धुतस्तत्पिन्वितो यदा वै सोमः पिन्वतेऽथैनं सर्वे देवाः सर्वाणि भूतान्युपयुञ्जन्ति पिन्वते ह वाऽअस्मै सोमो य एवमेतद्वेद न ह वाऽअस्याप्रवर्ग्येण केन चन यज्ञेनेष्टं भवति य एवमेतद्वेद।३०।
अथैतद्वै । आयुरेतज्ज्योतिः प्रविशति य एतमनु वा ब्रूते भक्षयति वा तस्य व्रतचर्या या सृष्टौ।३१।
(शतपथ ब्राह्मणम् १४.३.२.२९-३१)

पशुबंध प्रवर्ग्य है। पशुबंध सब कुछ है, प्रवर्ग्य सब कुछ है। जब हवि आग पर रखी जाती है तो यह आग पर रखा हुआ घर्म है। जब तैयार हो जाती है तो यह पका हुआ घर्म है। जब आहुति दी जाती है तो यह भरपूर घर्म होता है। जब भरपूर घर्म होता है तो सब देव और प्राणी जीविका चलाते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसके लिए पशुबंध पुष्कल जीविका देता है।

सोम प्रवर्ग्य है। सोम सब कुछ है, प्रवर्ग्य सब कुछ है। यह जब निचोड़ा जाती है तो यह आग पर रखे हुआ घर्म के समान है। जब तैयार हो जाता है तो यह पके हुआ घर्म के समान है। जब आहुति दी जाती है तो भरपूर घर्म के समान है। जब भरपूर सोम होता है तो सब देव और प्राणी इससे जीविका चलाते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसके लिए सोम सब कुछ देता है। और उसके लिए जो कुछ यज्ञ किया जाता है, वह प्रवर्ग्यशून्य नहीं होता।
जो इसकी शिक्षा करता है या इसका भक्षण करता है, यह प्रवर्ग्य उसकी आयु तथा ज्योति में प्रवेश करता है। इसकी व्रतचर्या वही है जो सृष्टि में है।

Pashubansh is Pravargya. Pashubansh is all inclusive, Pravargya is all inclusive. When the offering is placed on fire, it is offering placed on fire. When it is ripe and ready, it is the offering fit to be given. When the offering is given in Fire, it is completion of offering. When the offering is ample, all of the deities and living beings get sustenance from it. Pashubansh provides ample sustenance to whoever understands this.

Soma is Pravargya. Soma is all inclusive, Pravargya is all inclusive. When it is strained, it is like offering placed on fire. When it is ripe and ready, it is the offering fit to be given. When the offering is given in Fire, it is completion of offering. When Soma is ample, all of the deities and living beings get sustenance from it. Soma provides ample sustenance to whoever understands this. Whatever Yajna is performed for him, is not devoid of Pravargya.
Whoever teaches it, or follows it, Pravargya enters his life and light. The rules of its fasting are the same as that of the universe.